शहीद भगत सिंह | motivational/inspiration story


शहीद भगत सिंह एक महान क्रांतिकारी

जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था यानी पाकिस्तान और भारत एक ही था जिन पर अंग्रेज राज कर रहे थे।

Born (जन्म)

कुछ समय भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1960 को जिला लायलपुर के बग्गा गांव में हुआ था। जो पाकिस्तान का हिस्सा है।

पिता और माता का नाम

भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कोर था। भगत सिंह के पिता और चाचा अरिजीत सिंह सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे।
भगत सिंह के परिवार के लोग बड़े वीर और साहसी थे। भगत सिंह बचपन से ही साहसी बहादुर और निडर थे। उनकी हिम्मत को देखकर उनसे बड़ी उम्र वाले बच्चे भी उनसे घबराते आते थे।
भगत सिंह के छोटे भाई का नाम कुलतार था

बचपन का किस्सा

एक बार की बात है जब वह अपने पिता के साथ खेत में गए तो उन्होंने अपने पिता से सवाल किया कि पिताजी आप खेत में क्या करते हो।
तो उनके पिता ने कहा हम लोग बीज बोलते हैं। जिससे फसल होती है और ढेर सारा अनाज भी होता है। इस पर उन्होंने अपने पिता से सवाल किया कि पिताजी ऐसा ही है तो आप लोग खेत में बंदूके क्यों नहीं बोलते। जो अंग्रेजों को मारने के काम भी आए और हमारे खेत में बहुत सारी बंदूके होंगी जिनसे हम अंग्रेजों को मार सकेंगे। यह सुनकर भगत सिंह के पिता बहुत खुश हुए कि उनका बेटा भक्ति की  राह पर जा रहे हैं।

13 अगस्त 1919 मैं कुछ ऐसा हुआ जिसने भगत सिंह के दिल और आत्मा को झिनछोड के रख दिया। क्योंकि इस दिन भारत के इतिहास का सबसे क्रूर नरसंहार हुआ था भारत के पंजाब प्रांत के अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के निकट जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड की जिसमें अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर ने रॉयल एक्ट के विरोध हो रही एक सभा पर बिना किसी चेतावनी के भी भीड़ में खड़े हजारों बेकसूर लोगों को मार दिया। इस हत्या में 1000 से भी ज्यादा लोग मारे गए थे।

महात्मा गांधी का आंदोलन

उसी दिन से भगत सिंह जी ने उनका बदला लेने की ठान ली थी और खून से लगी हुई मिट्टी मूठी लेकर आ गए और उस समय उनकी  उमर सिर्फ 12 साल की थी।
दोस्तों यह वह तारीख है जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया था जिसके अनुसार उन्होंने कहा कोई भी हिंदुस्तानी ब्रिटिश सरकार का साथ ना दे हर सरकारी नौकर नौकरियां छोड़ दे मजदूर फैक्ट्रियों से निकल आए कोई किसी की तरह का टैक्स ना दे सारे विदेशी कपड़े जला दे।

5 फरवरी 1922 को गोरखपुर जिले के चोरी चोरा नामक स्थान पर पुलिस ने जबरन एक जुलूस को रोकना चाहा इसके फलस्वरूप जनता ने क्रोध में आकर पुलिस थाने में आग लगा दी जिसमें एक थानेदार और 21 सिपाहियों की मौत हो गई इस घटना से गांधी की स्तब्ध रह गए इस बात से नाराज होकर गांधी जी ने अपना आंदोलन यह कहकर वापस ले लिया की स्वतंत्रता के लिए अभी हमारा देश पूरी तरह से तैयार नहीं है गांधीजी के असहयोग आंदोलन को रखकर देने के कारण भगत जी के मन में गांधीजी के प्रति क्रोध उत्पन्न हो गया लेकिन पूरे राष्ट्र की तरह हुआ है बीमा गांधी का सम्मान करते थे। फिर भगत सिंह जी ने कहीं जुलूस में भाग लेना शुरू करो उनके दल के प्रमुख कार्यों में चंद्रशेखर आजाद सुखदेव इत्यादि थे।
9 अगस्त 1925 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम क्रांतिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने के इरादे से हथियार खरीदने के लिए बेटी सरकार का एक खजाना लूट लेने की एक ऐतिहासिक घटना हुई थी जिसको आज हम काकोरी कांड के नाम से जानते हैं काकोरी कांड में पकड़े गए क्रांतिकारियों में से 4 क्रांतिकारी को फांसी और 16 क्रांतिकारियों को उम्र कैद की सजा हुई इस बात से भगत सिंह कितने क्रोधित हुए की कि उन्होंने 1928 में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन विला कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।

साइमन कमीशन का भहिष्कार

30 अक्टूबर 1928 इसमें साईं साइमन कमीशन के भरिष्कार के लिए 30 अक्टूबर 1928 में इन्होंने लाहौर के एक विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया जिसके दौरान हुए लाठीचार्ज लाला लाजपत राय जी पूरी तरह से घायल हो गए उस समय लाला लाजपत राय जी ने कहा था मेरे शरीर पर एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में कील का काम करेगी।
17 नवंबर 1928 इन्हीं चोटों की वजह से लाला लाजपत राय की देहांत हो गया और लाला लाजपत राय की मृत्यु होने से पूरा देश गम में डूब गया लेकिन भगत जी और उनके साथियों ने अंग्रेजी सरकार को सबक सिखाने के लिए एक योजना बनाई।
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भगत सिंह


दिल्ली के केंद्रीय असेंबली में फेंके बंब

8 अप्रैल 1929 ब्रिटिश सरकार का मकसद सिर्फ भारत देश को लूटना और उन पर शासन करना था अपने इसी नापाक इरादे के साथ ब्रिटिश सरकार मजदूर विरोधी बिल पारित कराना का चाहती थी लेकिन भगत जी चंद्रशेखर को यह मंजूर नहीं था। कि देश के उन मजदूरों से बिल वसूला ना जाए जिनकी हालत पहले से खराब थी और इसी बिल पर विरोध जताने के लिए भगत जी और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली के केंद्रीय असेंबली में 8 अप्रैल 1929 को बम फेंके वहां बम फेंकने का मकसद किसी की जान लेना नहीं बल्कि बीडी सरकार को अपनी बे खबरी भरी नींद से जगाना था।और इसीलिए असेंबली में फेंके गए बंब बड़ी सावधानी से खाली जगह का चुनाव करके फेंके गए और उन बंब जानलेवा विस्फोटक इस्तेमाल नहीं किया। बंब फेंकने के बाद भगत जी और उनके साथी इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए स्वयं अपनी गिरफ्तारी दी बरसेगी नेत्री निश्चय कर लिया था। उनका जीना इतना जरूरी नहीं है जितना कि अंग्रेजों के भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचार से छुड़ाना।

भगत सिंह की गिरफ्तारी

 गिरफ्तार होने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने गिरीश जेल में रखा गया भगत सिंह न्यूज़ जेल में देखा कि वहां रखे गए अंग्रेज भारतीय कैदियों में बहुत बेवफा होता है भारतीयों के आगे के लिए वहां सब कुछ दुखदाई था। जिन्हें प्रशासन द्वारा उपलब्ध गए द्वारा  परिस्थितियां नहीं बदली गई थी। जेल चूहा और कॉकरोच से भरा रहता था पढ़ने या लिखने के लिए कागज या पेन आदि नहीं दिया जाता था यहां तक कि उसी जेल में अंग्रेज कैदियों को सारी सुख सुविधाएं उपलब्ध थी यह देखकर भगत सिंह ने कहा आनंद सबके लिए एक है उन्होंने यह निर्णय ले लिया भारतीयों के साथ इंसानों जैसा व्यवहार नहीं किया जाता खाने लायक खाना साफ-सुथरे कपड़े पढ़ने के लिए किताबें और अखबार नहीं मिलती उन्होंने यह शर्त रखी कि जब तक यह सब नहीं किया जाता तब कोई भी भारतीय खाना नहीं खाएगा।
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शाहिद भगत सिंह

भूख हड़ताल का सफर

जून 1929 यहां से सफर शुरू होता है उनकी भूख हड़ताल का जिसमें बटुकेश्वर दत्त ने भी उनका साथ दिया दोस्तों उनकी भूख हड़ताल जुड़वाने के लिए अफसरों ने उन पर ऐसे जुर्म उठाए जिसकी कल्पना करके भी रूह कांप जाए घंटों तक बर्फ की सीढ़ियों पर लिफ्टाकर कोड़ों से पीटा गया। जबरदस्ती उनके मुंह में दूध डालने की कोशिश की गई लेकिन मैं अपने हौसलों की इतने पक्के थे तो उन्होंने एक बूंद दूध भी अपने मुंह में नहीं लिया। और कुछ दिनों बाद भगत सिंह को लाहौर जेल में शिफ्ट कर दिया गया जहां उनके वाक्य साथियों को भी रखा गया था भगत सिंह की भूख हड़ताल कर देख कर उन सब ने भी भूख हड़ताल करना शुरू कर दिया इसमें जितेंद्र नाथ दास आदि क्रांतिकारी शामिल थे। इसी वजह से उन्हें कई केंद्रों तक पानी भी नहीं दिया जाता था।

भगत सिंह के साथी की मौत

13 सितंबर 1929 भूख हड़ताल के कारण एक महान क्रांतिकारी जितेंद्र नाथ दास की मृत्यु हो गई जिन्होंने 63 दिनों तक कुछ नहीं खाया था लेकिन भूख हड़ताल और टूट रही उनके इस सदमे में पूरे भारत को हिला दिया आखिरकार अंग्रेजी सरकार को उनकी हड़ताल के आगे घुटने टेकने पड़े और भगत सिंह के सारी शर्तों को मानना पड़ा।
5 अक्टूबर 1936 यह भूख हड़ताल पूरे 116 दिन के बाद को तोड़ी थी। भगत सिंह जी का वजन 60 किलो था लेकिन इस भूख हड़ताल के बाद उनका वजन 6 किलो कम हो गया था।

भगत सिंह को सुनाई फांसी की सजा

26 अगस्त 1930 को अदालत ने भगत सिंह जी को अपराधी घोषित कर दिया और 7 अक्टूबर 1930 को जिसमें भगत सिंह सुखदेव और शिवम राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई और अन्य भारतीयों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

23 मार्च 1931 फांसी का दिन

फांसी देने का दिन 24 मार्च 1931 को रखा गया था लेकिन भारतीय में काफी सारा क्रोध भरा हुआ था। इसलिए अंग्रेजों ने भारतीय भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी देने का सोचा। जब भगत सिंह का पता चला कि उनके फांसी का दिन आ गया है उस वक्त वह किताब पढ़ रहे थे तब उन्होंने पुलिस अधिकारी को कहा ठहरी है पहले एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल तो ले फिर 1 मिनट बाद किताब को छत की ओर उछाल कर बोले ठीक है अब ।
फांसी पर जाते समय भगत सिंह सुखदेव और शिवराम राजगुरु मजे से गाना गा रहे थे और फांसी के तख्त पर खड़े होकर उन्होंने जोरदार इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए वह तीनों बहुत खुश थे क्योंकि वह तीन अपने देश के लिए कुर्बानी देने जा रहे थे।

 भगत सिंह द्वारा अपने भाई को लिखा गया आखिरी पत्र

सेंट्रल जेल, लाहौर,
3 मार्च, 1931
अजीज कुलतार,
आज तुम्हारी आँखों में आँसू देखकर बहुत दुख हुआ। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था, तुम्हारे आँसू मुझसे सहन नहीं होते।
बरखुर्दार, हिम्मत से शिक्षा प्राप्त करना और सेहत का ख्याल रखना। हौसला रखना और क्या कहूँ!
उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फा क्या है,
हमे यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
दहर से क्यों खफ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे।
अच्छा रुख़सत। खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं। हिम्मत से रहना। नमस्ते।
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह

23 मार्च 1931 शाम को करीब 7:00 बजे भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई ज्यादातर लोगों ने यहां तक ही सुना हुआ है कि उनको फांसी दे दी गई थी लेकिन कहानी  अभी खत्म नहीं होती। कहीं कोई आंदोलन ना बढ़ जाए। 

भगत सिंह के शरीर के कर दिए टुकड़े

इसके डर से अंग्रेजों ने पहले जेल के पीछे की दीवार तोड़ दी और इनके शरीर के टुकड़े कर दिए और फिर इन्हें बोरियों में भरकर पीछे के रास्ते से फिरोजपुर की ओर ले जाया गया जहां में मिट्टी तेल डालकर इनके शरीर को जला दिया गया। जब गांव के लोगों ने आग जलती देखी तो वह उसके करीब जाने लगे इन से डरकर अंग्रेजों ने उनके आधे आधे चले टुकड़ों को जल्दी-जल्दी नदी में फेंका और भाग गए जब गांव वाले पास आए तो इनके शरीर को एकत्रित कर विधिवत अंतिम संस्कार किया और भगत सिंह सुखदेव राजगुरु हमेशा के लिए अमर हो गए।
अंतिम लाइन
दोस्तों जरा सोचो इस देश की ताजा सुरक्षित हवा में हम सांस ले रहे हैं। आज महावीरों की वजह से हमारा देश आजाद है।

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